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Short Story in Hindi love | With Pictures

Short Story in Hindi love

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Short Story in Hindi Love, लव स्टोरी एसएमएस, बेस्ट लव, बहुत दुखद, रोमांटिक लव स्टोरी इन हिंदी। Short Story in Hindi with Pictures

ग्रामीण डाकघर में काम का इतना बोझ बढ़ गया है कि पुछिये लपटोलिया के पोस्टमास्टर विजय बाबू को न खाने की फुर्सत मिलन नहाने की। लेकिन गलथोथरी और किचकिच करने से उनका माथ भरिया जाता है।

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पोस्ट ऑफिस के कोने-कोने में कागजों का ढेर लगा रहता है। कि चूहा कुतर रहा है, किधर दीमक चाट रहा है, उसे देखने की विजय बाबी फुर्सत कहां? उनका तो पूरा समय पेंशन भुगतान और हिसाब-किताब में ही बीत जाता है। 

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विजय बाबू के कुर्सी पर बैठते ही पेंशनधारियों का मजमा लग जाता है। वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन फिर नरेगा और मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों के भुगतान की जवाबदेही विजय बाब के कंधों पर ही है न। बूढ़ा और बूढ़ी से पोस्ट ऑफिस भरा रहता है। न तो बेंच पर जगह, न चौकी पर, न तो जमीन पर जगह खाली रहती है। खड़े रहने पर भी आफत।। सबका तो एक ही लक्ष्य है पैसा।

अब विजय बाबू क्या करेंगे? सबको एक नजर से देखना पड़ता है।। शिकायत हो गई तो और आफत। वार्ड कमिश्नर. ग्राम-सेवक से लेकर बी.डी.. तक का काम सिर्फ पेंशन पास करना है। भगतान की सारी जिम्मेदारी पास्ट। ऑफिस की हो जाती है।

पेंशन में टेंशन सबके साथ है सिर्फ विजय बाब के साथ ही नहीं। ग्राम सेवक और वार्ड कमिश्नर के दबाव के कारण कभी-कभी गलत काम न करना पड़ता है। कम उम्र वाले को भी पेंशन के लिए अग्रसारित करना st.आ. साहब को डर है कि जितना पास किये हैं कहीं गलत निकर

कड़ा है। सरकार को चिन्ता है

Short Story in Hindi love With Pictures
Short Story in Hindi love With Pictures

Short Story in Hindi love

पेंशनधारियों के लिए पैसे का जोगाड़ करने की। बहुत भेड़ियाघसानी कारोबार हो गया है  पोस्ट ऑफिस का। किसके हाथ में हथकड़ी लगेगी कहना मुश्किल है।

पोस्ट ऑफिस में पैसा रहे या न रहे मजमा तो रोज लगना ही है। यानि दो कहा जाय कि लपटोलिया का पोस्ट ऑफिस एक तरह का ‘मजमा सेन्टर’ हो गया है। गांव-घर का किस्सा सुनाने के लिए इतनी उपयुक्त जगह औरतों को कहां नसीब होगी?

जो कभी बेचारी रिक्शे पर नहीं चढ़ी थी, पेंशन ने रिक्शे का मुंह दिखा दिया। पैसा का टेर लेने के लिए रिक्शे से ही आना-जाना करना पड़ता है। ढलती उम्र ने उनको लाचार भी तो बना दिया है। सिर्फ लाठी के सहारे इस ढलती उम्र में मीलों का सफर तय करना मुश्किल है।

किसी-किसी बड़ी का तो पेंशन रिक्शा में ही चला जाता है। चला जाता है तो क्या, पोस्ट ऑफिस का हवा पानी भी लेना जरूरी है न..? दिक्कत क्या है, अगले महीने फिर पेंशन मिलेगी? कोई काम करके पेंशन लेना है क्या?

बहुत गिड़गिड़ाने के बाद भी बीड़ी और हुक्का के लिए बेटे से मांगने पर नहीं मिलता था। अब बेटा ही आगे पीछे किया करता है। सरकार ने पेंशन की पोटली खोलकर मुर्दे को जिन्दा कर दिया है। यह क्या कम है?

विजय बाबू के पास पहले तीन आदमी थे अब दो स्टॉफ यचे हैं। काम ज्यादा और आदमी आधा। अकेले विजय बाबू को सारा काम जवाबदेही के साथ निबटाना पड़ता है।

रोज का रोज लेबलिटी भरकर भेजी जाती है विजय बाबू द्वारा। उस हिसाब से पैसा आता कहां है? पेंशनधारी कितना समझेंगे भितरिया बात। पैसा के लिए हंगामा करते रहते हैं। कहाँ से पैसा आता है और कौन देता है इससे किसी को कोई मतलब तो है नहीं।

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जब से विजय बाबू को पता चला है कि अब शिक्षकों का भी पेंशन भुगतान पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलेगा तो उनका माथा और भी भारी हो गया है। श्रोड़ा-थोड़ा दर्द सीने में होने लगा है।

मन ही मन वे बुदबुदाने लगते हैं होगा अब और बंटाधार। मूर्ख को समझाना तो आसान है पर पढ़े-लिखे को कौन समझायेगा? हार्ट का मरीज बनना अब तय हो गया विजय बाबू का।’

आज विजय बाबू कुछ ईजी मूड में लग रहे थे। सोच रहे थे कि अभाव में भीड़-भाड़ कम होगी लेकिन यह क्या?

पक्का दस बजे गले में गमछा लटकाते हुए टिपुआ आ जाता है और पर हाथ फेरते हुए विजय बाबू से कहता है

‘आय तेसरो दिन छिकै पोस्टमास्टर साहब जे अपने लींगा ऐलो निय टिपआ ऐसनो आदमी के पैसा लेली मसक्कत कर पड़े छै, ठीक बार एना के टरकैभी त बेरगरे देखी लेभौं?’

‘बढ़िये बात है न जो यहां आकर आप दर्शन दिये’, विजय बाब ने कहा-‘आपको टरकाने का लोगों में हिम्मत चाहिए।’

की बढ़िया बात है’, टिपुआ ने कहा-‘हाथों में पैसा ऐतै तबे नी बढ़िया बात। तोरो बोली में लगै छै खाली जहरे मिलतो रहे।’ _ ‘आयगा पैसा, लेकिन कहना मुश्किल है कब आयगा?’ विजय बाबू ने कहा।

देखो मास्टर बाबू! आय जों पैसा न मिलथौं त सच कहैं छिहाँन तोरो नरेटी दाबी देभी’, टिपुआ ने धमकाते हुए कहा- केश मुकदमा होते त वोकरो गम फिकिर नै छै। कते नी केश मुकदमा अभियो कचहरी में लटकलो छै। छै त छै टिपुआ के कोय अंतर नै पड़े छ।’

‘नरेटी दाबने से क्या पैसा मिल जायेगा?’ तबे ठांय-ठांय करला सें?’ इस तरह की बेतुकी बातें सुनकर वहीं बैठी भकुनीदेवी से नहीं रहा गया, उसने टिपुआ से कहा

‘अरे टिपुआ एना कहिने बोलै छै रें। हमरा आगू में जन्मल्ह आरो तोरी साठ बरस कहिया पूरी गेलो रे?  चोरी आरो सीना जोरी? पोस्टमास्टर साहब चाहतौ त तोरा जेल भेजवाय देतौ।’ 

‘अगे बुढ़िया! ढेर खैरखाही अच्छा नै लगै छै’, टिपुआ ने कहा- तोही सिनी घूस दे देके पोस्टमास्टर साहब के बिगाड़ी देने छ।’

‘जो रे छौंडा, कते बोले हैं, भकनीदेवी ने कहा-‘लर जूत रहथिया एन्हें बड़ो से बोलथिहैं। पोस्टमास्टर साहब की घरो से पैसा देती।’

तबे की तोय अपना घरों से पैसे देभै की?’ ‘एना हरमुट्ठी बोली बोलला सें आरो काम बिगड़ी जैतौ।

कालियौ नी बुढ़िया मुहों के सीबी के राख’, टिपुआ ने कहा- त सब पशय देबौ। जाय के सांय आरो बेटा से शिकायत करिहें। देखबौ नी की.

लेतौ? बेटवा सब पैसा पेंशन के छिनये लै छौ, कहि चोकरा से पिस्टल बीटी लेतौ। हम्मू उन्ने से श्री नट ले के ऐबौ, अबकी बेर अच्छे से फरियाय रेगा अभिया कहै छिहौ की चुप रहें बुढ़िया।’

बस देखकर बगल में बैठी सितया माय को नहीं रहा गया, भकनीदेवी का बचाव करते हुए बोली 

रे टिपआ तोय की हिरो बनी गेलो छ? भनी से ऐना कहिने बोली रहलो छ। अभी तोरो उमर पचासो नै पुरलो छौ आरो बहस करी रहलो छ। केना केना धमकाय के सठवर्षा पेंशन ले लेल्हैं सबके पता है। टोला में लपटगिरी के सिवा तोरो की काम छौ? अभी बीस मौगी यहां बैठलो छै, एक एक थप्पर जो लगी जैतौ त जान बचाना मुश्किल थे जैतौ।’

‘अहो! तोय छिकै सितया माय, मौगी के सरदार’, टिपुआ ने कहा-‘तोय हमरा थप्पर मारौं। तोरों से सलटी लेबी कहीं दै छियौ।’

वहस के दौरान ही पोस्ट ऑफिस के आगे मुखिया सुधीर की मोटरसाइकिल लग जाती है। वह दनदनाकर पोस्टमास्टर साहब के पास पहुंचता है। नमस्ते कहकर कुर्सी खींचकर बैठ जाता है।

टिपुआ पर नजर पड़ते ही बोला-‘की हाल छौ रे टिपुआ।’ ‘ठीक्के छै।’ ‘पैसा ले. की।’ ‘हाँ त कथीं ले ऐबै यहा?’ ‘मिललौ?’ ‘पोस्टमास्टर साहब होशियारी बतियाय रहलो छ।’ ‘होशियारी!’ ‘पुछी के देखो, आपने पता चली जैथौं।’

क्यों नहीं पैसा देते हैं पोस्टमास्टर साहब’, मुखिया ने विजय बाबू की आर सर घुमाते हुए कहा-“टिपुआ का पैसा पास हो गया है विजय बाबू। इसको पैसा देने में अब कोय परेशानी नहीं है।’Short Story in Hindi love

जानते हैं पर पोस्ट ऑफिस में पैसा रहेगा तब न।’ विजय बाबू ने कहा। पैसा क्या टिपुआ लायगा कि आपको जोगाड़ करना है?’ सुधीर मुखिया ने कहा।

सलतानगंज डाकघर से पैसा खुद भेजा जायेगा।’ विजय बाब कहा-रोज का रोज लेबलिटी जो भेजा जाता है। कितना बकाया है मशाल को सब पता है? वहां बैठे लोग बहुत चतुर, चालाक और सयाना है।

‘नहीं! नहीं विजय बाबू। ई बोलने से काम नहीं चलेगा-‘मुखिया ने कहा-‘कुछ तो गरीब और असहाय के लिए आपको पहल करनी ही पड़ेगी।

‘तब आप क्या चाहते हैं, पैसा लाने पोस्टमास्टर खुद जायगा’, विजय आबू ने कहा-‘अपना पैसा खर्च कर जायेंगे और आने में कोई पैसा छीन लेगा तो कौन देगा? जान भी जा सकती है ऐसे में। नौकरी करने आये हैं कि जान गंवाने। आप उस समय पीठ दिखाकर नौ दो ग्यारह हो जाइयेगा।’

‘दस टका वसूलते क्यों नहीं बुढ़वा-बढ़िया से? ‘गवाह दिलवाने का तो ढेर पैसा देती है और आप कहते हैं….’

‘हम तो डेली आते हैं पोस्ट ऑफिस तेल खर्चा करके, हमीं दे देंगे गवाही’, सुधीर मुखिया ने कहा-‘लेकिन इन लोगों का पैसा ऐसे में सब रिक्शे में ही चला जायगा तो खायगा क्या सुथनी….?’

‘खा ही रहा है न मेरा माथा….।’ पोस्टमास्टर ने कहा।

‘आपका क्या खायगा माथा पोस्टमास्टर साहब’, मुखिया ने कहा-खाता है तो मेरा माथा ये लोग भर दिन। सरकार भी नौटंकी करती है। खाली बोट की राजनीति करती है। पेट्रोल और डीजल का दाम बढ़ा देती है और सब दिया हुआ पैसा वसूल लेती है। पैसा लेने के लिए चक्कर लगाते रहिये रोज। यही सब न लंद फंद करके सरकार भी पैसा जुटाती है। कोनो घर से पैसा वह देती है? ई कोठी का धान ऊ कोठी में।’

‘मुखिया जी! राजनीति का गप यहां नहीं ही कीजिये तो अच्छा।’

सबका पेट जल रहा है और आपको राजनीति का गप लग रहा है, मुखिया जी ने कहा-‘पेंशनधारियों की चिन्ता छोडकर आप सरकार के पक्षधर हो गये हैं क्या?’

पक्षधर! हम तो सूचना देकर पैसा बांटते हैं’, विजय बाबू ने कहा- लेकिन ये लोग मानते ही नहीं है। नौंद टूटते ही भोरे भोर पोस्ट ऑफिस की ओर दरबन लगाने लगते हैं। ठीक से मैं ब्रश भी नहीं कर पाता हूं। मेरी इसमें क्या गलती है बताइये?’

‘चलो न मुखिया जी सुलतानगंज में ही सबके रपेटियै त चारो दिशा मुझे लगते’, बीच में हस्तक्षेप करते हुए टिपुआ ने कहा-‘टेबुल-कुर्सी फेके लगबै त समझ में ऐसे।’

‘तुम क्या अपना घर समझते हो टिपुआ।’ मुखिया ने उसे समझाते हुए कहा-‘सरकारी विभाग है, जेल की हवा खाने लगोगे। शिकायत करने से भी कोई फायदा नहीं है कहीं। पोस्टमास्टर साहब ठीक कहते हैं। आराम से घर में बैठो। पैसा तुम्हारा है कोई खा नहीं जायेगा? सरकार के घर में देर है लेकिन अधेर नहीं है।’

मुखिया की बातों पर सबने यकीन कर विजय बाबू पोस्टमास्टर को जोरदार सलामी ठोककर सभी वहां से प्रस्थान कर गये।

सबके जाने के बाद मुखिया जी ने विजय बाबू के कान में कुछ बुदबुदाया-‘मेरा भी मनरेगा में लेबर का पैसा बकाया है विजय बाबू। भुगतान में काफी विलम्ब हो गया है। गाली-गलौज सब करता है घर पर जाकर। कैसे काम होगा? घर का भी पैसा खर्च हो गया है।’

‘तब तो आपका हेवी एमाउन्र होगा?’ ‘हो! है तो करीब पचास हजार।’ ‘तब तो सुलतानगंज डाकघर से ही पास करवाकर पैसा भेजवाना होगा।’

‘असल में विजय बाबू क्या कहें आपसे’, सुधीर मुखिया ने कहा-‘मैं वहां जाना नहीं चाहता हूं।’

‘क्यों?’ Short Story in Hindi love

‘दान-दक्षिणा में सौ दो सौ रुपये देखते-देखते लग जाता है’, मुखिया ने कहा-‘चाय-पान कराना पड़ता है सो अलग।’

‘युग के अनुसार तो चलना ही पड़ता है न मुखिया जी’, विजय बाबू ने कहा-‘हर जगह तो एक ही सिस्टम है।’

‘तो ठीक है पोस्टमास्टर साहब, अब चलते हैं’, सुधीर मुखिया ने कहा-‘सही में पेंशन में टेंशन’ हर जगह है।’

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